रविवार, 9 नवंबर 2014

सुनों



ख़ुशी बन के रहो या के गम बन के रहो ।
मैं तो ये चाहूं तुम बस मेरे ही बन के रहो ।
कोई भौरे नहीं हो तुम जो आवारा फ़िरो ।
फूल हो बाग़ के एक शाख पे तन के रहो ।
फूल की खुशबू का हक है चमन को भी ।
चाहें कांटो में खिलो दोस्त पवन के रहो ।
तेज हवाओं में तो झुक जाना ठीक है ।
टूटने का खतरा है जो ज्यादा तन के रहो।
जिंदगी जीने का दौर कुछ एसा हुआ है
अच्छा यही है के अब हो कफ़न के रहो ।
_____शिवराज___________

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