बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

जिंदगी पर



मुझको बदला जिंदगी ने आहिस्ता आहिस्ता ।
एक तू था की पल में बदल डाली थी जिंदगी ।

मैंने जिंदगी जी है बच्चों के खिलौने की तरह ।
सब को हँसाने के बाद तोडा गया बुरी तरह् ।

ये सोचने की मुझे न जाने क्या मजबूरी है ।
जीना जरुरी है या के फिर जिंदगी जरुरी है ।

मैं ये मान लूँगा की जिंदगी एक सफ़र है ।
मगर शुरुआत कहाँ है और अंत किधर है ।
----शिवराज---
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