मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

डर /Fear

एक दोस्त के उत्साहवर्धन के लिए
********************************
जो अभी मिला नहीं उसके खोने का डर क्यों ।
अंजाम होगा जो भी आगाज़ पे असर क्यों ।
हम क्यों हमेशा कमतर समझते है खुद को ।
मैं समझ न पाया ये होता है, मगर क्यों ।
तू बढ़ जा, लड़ जा, मर जा ये समर है प्यारे ।
मरना है एक बार तैयार कर खुद को ।
शिवराज

शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

वक़्त/वक़्त

कभी बुरा बन के सताता है ।
कभी दीवार बन के बचता है ।
वक़्त की वक़्त ही जाने,मैं क्या ।
ये वही करता है जो चाहता है ।
कभी बड़ी तेज चाल चलता है ।
कभी पल साल भर सा लगता है ।
होता है सब के पास बराबर ।
लेकिन किसी किसी को फलता है ।
बात समझदारों ने ही बताई है ।
बुरे वक़्त में भी एक अच्छाई है ।
ये असलियत निखार देता है ।
कई चेहरों से नकाब उतार देता है ।
मेरी गुजारिश है वक़्त को पहचानो ।
गुजरने पे कहाँ ये मिलता है ।
जो वक़्त के साथ चलता है ।
वक़्त भी उसके साथ चलता है ।
---------शिवराज------------------

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

मजबूरी /Majboori

हरदम तो कोई मुस्कुरा नहीं सकता ।
हर बात अपनों से छुपा नहीं सकता ।
ढलक जाते है रुखसार तक आंसू ।
चाहे जबां से कुछ बता नहीं सकता ।
*********शिवराज ******
Hardam to koi muskura nahi sakta
Har baat apno se chupa nahi sakta
Dhalak jaate hain rukhsar tak aansoo Chahe jaban se bata nahi sakta
***********Shivraj***********