गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

मुसाफिर

बेखबर था तेरे शहर का मुसाफिर बाख़बर नहीं था
उस रस्ते पे चल पड़ा जिसपे तेरा घर नहीं था
दीवानगी घुमाती फिरती रही उसको हर तरफ
होश आया तो देखा वो जहाँ से चला वहीँ था
~~~~~शिवराज~~~~~~~~~~

कुछ भी हो सकता है


वक़्त की इच्छा है वो बदल सकता है
खोटा सिक्का भी कहीं चल सकता हैं
उसको ज्यादा सोचना अच्छा नहीं
कभी कोई ख्वाब पल भी सकता है
हर आदमी को शक के दायरे में रखो
कोई भी कुछ भी निकल सकता है
कभी देखा भी है इंसान को रंग बदलते
यूं ही गिरगिट को माहिर समझ रखा है
दुनियां में जीने की अदा को ऐसे समझो
जैसे पानी माटी के साँचे में ढल सकता है
~~~~~शिवराज~~~~~~~~~

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

कुछ बातें



पूछा जो मुझसे किसी ने बता क्या तेरे ख्वाब हैं ।
मैं बोला ख्वाब में भी वही है जिनके मुझे ख्वाब हैं ।
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मुझसे पुछा जो किसी ने क्या तुम्हारे ख्वाब हैं ।
हँसते हुए कहा अब ख्वाब ही तो मेरे ख्वाब हैं ।
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शिवराज